सोमवार, 25 जुलाई 2011

एक सुनहरा सफर यादों का

यात्रा व्रतांत  - 01



येलो जी काठगोदाम स्टेशन भी आ पाहुचे हालांकि गाड़ी तो काफी स्टेशन पहले ही खाली हो चुकी थी और वैसे भी ये इस तरफ का इंडिया का अंतिम स्टेशन है जिस डब्बे  मे मैं बैठा था उसमे हमारे आलवा मात्र दो या तीन सवारी ही होगी। मैंने भी सोचा की गाड़ी जल्दी चलने वाली तो नहीं इसीलिए आराम से जूते पहन रहा था की इतने मे मेरे दोस्त ने मुझे आवाज़ लगाई दीपक भाई ज़रा जल्दी आ। मैं जिज्ञासा मैं उसकी तरफ लपका की क्या हुआ उसने अपना हाथ उठाते हुये एक और इशारा किया की वो देख क्या है उफ मैं भी वो नज़ारा देख चौंक गया था मानो घनघोर काले बादल (जो मुझे शायद ही कभी मेरी दिल्ली मैं देखने को मिलते है) पहाड़ की चोटी पर नतमस्तक थे। उन्हे देख कर ऐसा लग रहा था की पहाड़ की चोटी बदलो को चीरती हुयी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रही हो। इन दृश्यों को देख मेरे मन में भी एक सवाल बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था की अभी तो मैं ट्रेन से उतरा भी नहीं हूँ।


खेर हम दोनों अपना एक मात्र बेग उठा कर ट्रेन से उतरे और स्टेशन से बाहर की और लपके रात भर का सफर करके थकान भी हो रही थी और भूख भी लग रही थी। हम लोग स्टेशन से बाहर निकले ही थे की बारिश ने हमारे जैसे सभी लोगो का स्वागत किया जो ट्रेन से उतरे थे। देखने से अंदाजा लगाया जा सकता था की ज़्यादा से ज़्यादा चालीस लोग उतरे होंगे पूरी ट्रेन से। बारिश की बुँदे शरीर पर गिर कर और ही मज़ा दे रही थी कहाँ दिल्ली की गर्मी और कहाँ यहाँ का मौसम लाजवाब। बाहर आते ही मैंने रोड के दोने और नज़र गुमा कर देखा सिर्फ कार नज़र आ रही थी एक भइसहब से पूछा की नैनीताल जाने के लिए बस कहाँ से मिलेगी तो जवाब मिला की यहाँ से सिर्फ टॅक्सी ही जाती है थोड़ी मशकत के बाद हमने एक टॅक्सी वाले से बात की और हम निकाल पड़े अपने गंतव्य की तरफ जैसे जैसे आगे जाते जा रहे थे वैसे वैसे मानो मेरे सब्र का बांध टूटता ही जा रहा था। क्या रास्ता था जैसे साँप सीड़ी मे साँप का होता है और एक तरफ खाई काफी देर बाद समझ मे आया की ट्रेन से जिस पहाड़ को देख मैं और मेरा दोस्त अचंभित थे हम उसी पहाड़ के ऊपर जा रहे थे। बारिश तो अपना कमाल दिखा ही रही थी। पता नहीं मेरा भ्रम था की मुझे वाकई मे ठंड का अहसास हो रहा था मैं ये सब सोच ही रहा था की मुझे ऐसा लगा जैसे चालक ने मेरे मन को भाँप लिया हो उसने सबसे पूछा की चाये पीनी है सबने एक साथ हाँ मे जवाब दिया। अरे हाँ मैं तो बताना ही भूल गया की जिस टॅक्सी से मे आ रहा था उसमे पहले से ही एक ग्रुप मोजूद था शायद ये चालक हम सब को साझा करके ले जरा रहा था।

उसने अचानक गाड़ी एक तरफ लगाई शायद कोई ढाबा था मैंने जैसे ही गाड़ी का दरवाजा खोला तो मेरा अहसास हकीकत बन गया बाहर वाकई ठंड हो रही थी और ऊपर से गिरती बारिश। फिर सबने वहाँ से चाये पी और मे आसपास का नज़ारा देखने लगा तो मुझे बहुत ही जल्द अहसास हो गया की हम अब बिलकुल बादलो की दिशा की और थे यानि पहाड़ की चोटी की तरफ। फिर से गाड़ी मे बैठे और चल पड़े मे हर ओर देख रहा था  ऊंची ऊंची पहाड़ी और कंही कंही बने घर जो देखने मे ऐसे लग रहे थे की अधपर लटके हो और ऊपर से उनकी  छत जिसकी वजह से वो झोपड़ी का आकार लिए हुये थे। इन घरो को देख कर मुझे "समीर लाल जी"  की  उड़न तश्तरी में  कही बात याद आ गयी की कनाडा मे तो

मकानों की बनावट ऐसी
न छत पर चढ़ना नसीब
न लेट चाँद तारों को निहारना..  


यहाँ भी कुछ ऐसा ही है की लेटे किधर पूरी छत तो ढलान नुमा बनी है। ठंडी हवा, बारिश और ये नज़ारे जो मुझे पागल सा कर रहे थे और मंज़िल तो अभी लगभग 5 किलोमीटर दूर थी।

अचानक मेरी नज़र उस झरने पर पड़ी जो एक तरफ कोने मे गिर रहा था मैंने भी चालक से रुकने का अनुरोध किया तो वो जवाब मे बोला की जनाब ये तो छोटा सा है ऊपर तो और भी मिलेंगे। उन टेड़े मेडे रास्तो का सफर पार कर चालक ने एक जगह गाड़ी रोकी और बोला की जनाब नैनीताल मे आपका स्वागत है हम फिर उसे पैसे दे कर नीचे उतर गए हालाकी बारिश हो रही थी और उसमे बड़ी बात की मुझे गजब की ठंड लग रही थी। हम लोग होटल जाने से पहले एक चाये की दुकान पर लपके वहाँ हमने चाये और पराठे का मज़ा लिया फिर बाहर आ कर देखा की आखिर है क्या यहाँ। क्या जगह है यह चारो तरफ पहाड़ो से घिरा और बीच मे पानी से लबालब भरा हुया तालाब। शायद अपनी जिंदगी मे इस से बेहतरीन जगह मैंने आज तक नहीं देखी थी की जिसे देख कर मेरे मुख से सिर्फ एक ही शब्द फूटा "लाजवाब"।

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