मंगलवार, 5 जुलाई 2011

उफ़ .....ये भी देखा है


ये उनके लिए जिने लगता है की मैं लिखता नहीं करता हूँ चोरी
क्या कहोगे तुम मुझसे, मालूम मुझे है की कविताये मेरी है कोरी

समय समय की बात है कभी कोई ज्यादा तो कभी कोई कम
बोलना सब जानते है की तू तू है पर हम नहीं किसी से कम
येही तुम्हारे मन की बात दिल में यही तुम्हारे है अरमा
नहीं देना है तो मत दो बढावा पर क्यों रहे हो शर्मा

हम क्या है ये तुम्हे तो क्या , खुद हमे  भी मालूम नहीं
मेरी हस्ती तो परवरदिगार से है, किसी और में दम नहीं
लिखे हम कितनी भी पंक्तिया उस से फर्क क्या पड़ता है
हमारी मेहनत पर न जाने क्यों लोगो का मुह सड़ता है

बस मन तो यही करता है की कागजों में रख दू विचार
न मिली प्रशंसा तो लिख न पायु इतना भी नहीं हूँ लाचार
तू देख यहाँ पर देख, क्यों लगता है की मैं लिख नहीं सकता
पढना है तो पढ़ले इसे वर्ना नाप सीधे अपना रास्ता

बस अब ज्यादा नहीं लिखता वर्ना लोग मुझे गाली देंगे
अब तो लगता है की वो लोग मुझे बढावा भी जाली देंगे
है सलाम उनको जिनकी बदोलत ये लिखा है मेने
बोल ले तू जो बोलना है की ये भी कंही देखा है तुने

क्या? क्या!!!! कहा "ये भी देखा है", उफ़ अब तो हद ही हो गयी जनाब

2 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत सुन्दर रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

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  2. कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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